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रघुवंश प्रसाद सिंह : गणित के प्रोफेसर से ‘वन मैन ऑपोजिशन’ और ‘मनरेगा मैन’ तक

मनरेगा मैन और राजद के दिग्गज नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का जन्म 6 जून 1946 को वैशाली के शाहपुर में हुआ था। रघुवंश प्रसाद सिंह को मनरेगा जैसे कार्यक्रम जनक कहा जाता हैं। रघुवंश बाबू आजीवन राजद में ही रहे। उन्होंने न कभी पार्टी बदली और न ही कभी विचारधारा। लेकिन आखिर वक्त में वो पार्टी और इस दुनिया दोनो को एक साथ ही अलविदा कह दिए।

भुजा फाँक कर गुजारते थे रात

रघुवंश प्रसाद सिंह बिहार यूनिवर्सिटी से गणित में डॉक्‍टरेट की उपाधि लेने के बाद सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में गणित के प्रोफेसर थे। साल 1977 में पूरे देश मे कांग्रेस विरोधी आंदोलन चरम पर था और इस आंदोलन का गढ़ बना था बिहार। बिहार में इसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण जी के हाथों में था।

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सीतामढ़ी में रघुवंश बाबू भी छात्रों के साथ इस आंदोलन में थे। अचानक 1977 की सुबह पुलिस ने रघुवंश बाबू को गिरफ्तार कर लिया। 3 महीने बाद जब रघुवंश बाबू जेल से निकले तो मकान मालिक ने उन्हें घर छोड़ने को मजबूर कर दिया। रघुवंश बाबु किराए का मकान छोड़कर हॉस्टल के कमरों में छात्रों के साथ रहने लगे।

उस वक्त उनके पास सम्पति के नाम पर कुछ किताबें, एक जोड़ी धोती-कुर्ता और एक गमछा था। वही कॉलेज के सामने शाम को समूह में राजनीतिक चर्चा करते हुए भुजा फाँकते थे और इसी भुजा पर सारी रात कट जाती थी। कहते है उस समय तनख्वाह इतनी नही थी कि घर पर पैसे भेजने के बाद रात के खाने के लिये पैसे बच सके।

पहली बार ही चुनाव जीतने पर कर्पूरी सरकार में बने मंत्री

आपातकाल हटने के बाद 1977 में लोकसभा चुनाव हुए कांग्रेस हार गई और सत्ता में आये मोरारजी देसाई। मोरारजी देसाई सत्ता में आते ही बिहार सहित 9 राज्यो के कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिये। बिहार विधानसभ चुनाव में रघुवंश बाबू को जनता पार्टी ने सीतामढ़ी के बेलसंड विधानसभा से उमीदवार बनाया। अपने जीवन के पहले ही चुनाव में रघुवंश बाबू 6 हज़ार वोटों से चुनाव जीते और पहला चुनाव जीतते ही कर्पूरी ठाकुर के सरकार में ऊर्जा मंत्री बने। रघुवंश बाबु 1977 से 1985 तक बेलसंड से विधायक रहे।

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लालू यादव से बढ़ी नजदीकी

कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार में राजनीतिक उठापटक शुरू हो गयी थी। इसी बीच लालू यादव बिहार में पिछडो के सबसे बड़े नेताओं के रूप में उभर रहे थें। 1990 के विधानसभा चुनाव में रघुवंश बाबू बेलसंड विधानसभा सीट पर कांग्रेस के दिग्विजय प्रताप सिंह से हार गए।

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रघुवंश बाबू चुनाव तो हार लेकिन बिहार में सरकार जनता दल की ही बनी। जनता दल में बड़े ही नाटकीय घटनाक्रम में लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। लालू यादव सीएम बनते ही रघुवंश बाबू को विधान पार्षद बनाये और बाद में 1995 में फिर से ऊर्जा और पुनर्वास मंत्री बने। इस घटना के बाद लालू यादव और रघुवंश बाबु में नजदीकिया बढ़ गयी। रघुवंश बाबू अगड़ी जाती से होने के बाद भी कभी भी पिछड़ी जाति के राजनीति में अनफिट नही हुए। लालू यादव रघुवंश प्रसाद सिंह को शायद इसलिए भी अपने बेहद करीब रखते थे।

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1977 से 1979 तक वे बिहार राज्‍य के ऊर्जा मंत्री रहे। इसके बाद उन्‍हें लोकदल का अध्‍यक्ष बनाया गया। 1985 से 1990 के दौरान वे लोक लेखांकन समिति के अध्‍यक्ष रहे। 1990 में उन्‍होंने बिहार विधानसभा के सहायक स्‍पीकर का पदभार संभाला।

वैशाली से पहली बार सांसद और केंद्र में पहली बार मंत्री बने

1996 के लोकसभा चुनाव में रघुवंश बाबू पहली बार लालू यादव जी कहने पर वैशाली से लोकसभा चुनाव लड़े। इसी सीट पर समता पार्टी से वृषण पटेल भी चुनाव लड़ रहे थे। रघुवंश बाबू समता पार्टी के वृषण पटेल को चुनाव हरा कर सांसद बने और दिल्ली पहुँचे।

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केंद्र में देवगौड़ा की सरकार बनी और पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले रघुवंश बाबू बिहार कोटे से पशुपालन और डेयरी राज्यमंत्री बने। 1997 में बड़े ही नाटकीय ढंग से देवगौड़ा को प्रधानमंत्री की कुर्शी छोड़नी पड़ी और इंद्रकुमार गुजराल पीएम बने। इंद्रकुमार गुजराल के प्रधानमंत्री बनने के बाद रघुवंश बाबू को खाद और उपभोक्ता मंत्रालय मिला।

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वन मैन ऑपोजिशन

रघुवंश बाबू को केंद्र की राजनीति में पहली बार पहचान 1999 में मिली। 1999 से 2004 के बीच रघुवंश प्रसाद संसद के सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक थे। एक दिन में उन्होंने कम से कम 4 और अधिकतम 9 मुद्दों पर अपनी पार्टी की राय रखी थी। यह एक तरह से रिकॉर्ड बन गया था।

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उस दौर में भले सोनिया गांधी विपक्ष की नेता थी लेकिन वाजपेयी सरकार को घेरने में रघुवंश प्रसाद सिंह सबसे आगे नजर आते थे। 1999 के चुनाव के कुछ दिनों के बाद रघुवंश प्रसाद सिंह विपक्ष की बेंच पर बैठे थे। बीजेपी नेता अरुण जेटली ने संसद की कार्यवाही में जाते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह को रोक लिया। जेटली मुस्कुराते हुए बोले, ‘तो कैसा चल रहा है वन मैन ऑपोजिशन?’ रघुवंश प्रसाद सिंह को यह बात समझ में नहीं आई। अरुण जेटली ने उस दिन का एक अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स उनकी ओर खिसका दिया। अखबार में चार कॉलम में रघुवंश प्रसाद की प्रोफाइल छपी थी, जिसका शीर्षक था, ‘वन मैन ऑपोजिशन।’

मनरेगा के सूत्रधार

यूपीए-1 शासन काल में केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में बनी सरकार में रघुवंश प्रसाद सिंह राजद कोटे से केंद्रीय मंत्री बने। 23 मई 2004 से 2009 तक वे ग्रामीण विकास के केंद्रीय मंत्री रहे। राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने अपनी पहली बैठक में रोजगार गारंटी कानून बनाने का प्रस्ताव दिया। इस कानून को बनाने का जिम्मा श्रम मंत्रालय को मिला लेकिन श्रम मंत्रालय ने 6 महीने में हाथ खड़ा कर दिया। श्रम मंत्रालय के बाद यह जिम्मा ग्रामीण विकास मंत्रालय को मिला। 2 फरवरी, 2006 को देश के 200 पिछड़े जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। बाद में 2008 में इस योजना को पूरे देश मे लागू किया गया।

वे ही सबसे पहले मनरेगा (महात्मा गांधी न्यूनतम रोजगार गारंटी) स्कीम लेकर आए। संजय बारु के किताब ‘एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री’ के अनुसार कांग्रेस ने इसका श्रेय राहुल गांधी को देने की कोसिस की। रघुवंश बाबू को इस दौरान अपने ही मंत्रीमंडल का विरोध झेलना पड़ा। मनरेगा के विरोध में सबसे अग्रणी पी चितम्बर और प्रणब मुखर्जी थे उनका तर्क था कि इससे राज्य के खजाने पर दबाव बढ़ेगा।

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राजनीतिक पंडितों के अनुसार 2009 के चुनाव जीतने में किसान कर्ज माफी और मनरेगा ही सबसे बड़ी रणनीति थी। यूपीए – 2 के दौरान भी मनमोहन सिंह रघुवंश बाबू के कामो से प्रभावित होकर दूसरी बार ग्रामीण विकास मंत्री बनने का ऑफर दिया। लेकिन लालू जी से दोस्ती के कारण उन्होंने यह पद ठुकरा दिया।

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2014 के मोदी लहर में रघुवंश बाबू लोजपा के बाहुबली रामसिंह से हार गए। 2019 के चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा। लालू जी के जेल जाने के बाद पार्टी का नेतृत्व तेजस्वी यादव के हाथों में आ गया।

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बीते दिनों पार्टी में रामसिंह के एंट्री को लेकर रघुवंश बाबू नाराज थे। फेफड़े की समस्या और सांस लेने में तकलीफ की समस्या पर 11 सितम्बर को AIIMS में भर्ती कराया गया,इससे पहले वो जून में करोना संक्रमित हुए थे। 12 सितंबर को AIIMS के बेड से ही लालू जी को पत्र लिखा “जननायक कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद 32 वर्षो तक मैं आपके पीछे पीछे खड़ा रहा। लेकिन अब नही। पार्टी नेताओं, कार्यकताओ और आमजनों ने बड़ा स्नेह दिया। मुझे क्षमा करें।”

रघुवंश बाबू के पत्र के जवाब में लालू यादव ने जेल से ही पत्र लिखा, “बैठकर बात करेंगे। आप कहि नही जा रहे हैं।” लेकिन रघुवंश बाबू कहा मानने वाले पार्टी छोड़ने के साथ ही आज रविवार (13 सितम्बर 2020) को दुनिया ही छोड़ दिये।

 

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