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नक्सलवाड़ी से शुरू हुवा जमीनदार विरोधी आंदोलन कैसे बना देशविरोधी नक्सलवादियों का समूह

नक्सल/नक्सलवाद/नक्सलवादी शब्द की उतपत्ति पश्चिम बंगाल की एक छोटी सी जगह नक्सलवाड़ी से हुई है। आज़ादी के बाद यह वह दौर था जब भूमि पर जमींदारों का मालिकाना हक कब्जा अधिकार या वर्चस्व हुआ करता था। 1967 में बिगुल नामक नक्सलवाड़ी के एक किसान ने अदालत से अपनी जमीन जमींदार ईश्वर टिर्की से वापस पा लेने का आदेश प्राप्त किया। जमींदार ईश्वर टिर्की ने किसान बिगुल को अदालत के आदेश के बावजूद उसकी जमीन वापस लौटने से इंकार कर दिया और अपने लठैतों से बिगुल की पिटाई करवा दी।

घायल बिगुल के समर्थन में इलाके के सारे किसान उठ खड़े हुए और उन्होंने जमींदार टिर्की को पीट-पीट कर मार डाला। बिगुल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का सदस्य था। इसके बाद इलाके के सारे किसान जमींदारों के कारिंदों लठैतों को मारने लगे उनके लाठी बंदूक हथियार छिनने लगे और जमीनों पर जबरन कब्जा करने लगे और कर्ज़ के कागजात जलाने लगे।

दूसरी तरफ मामले की जांच के बहाने पुलिस जमींदारों के पक्ष में आ गयी। 23 मई 1967 को आंदोलन के दौरान तीर कमान से लैस किसानों व हथियारबंद पुलिस के मध्य खूनी संघर्ष हुआ जिसमें 3 पुलिसकर्मी घायल हुए व घायल दरोगा सुनाम वांगदी ने उपचार के दौरान अस्पताल में दम तोड़ दिया।

नक्सलवाड़ी आंदोलन 52 दिन चला

25 मई 1967 को जवाबी कार्यवाही में पुलिस व बीएसएफ ने बलप्रयोग से इस आंदोलन को कुचल डाला। इस घटना में किसानों के घेरे में घुसकर पुलिस ने संगीन से एक बूढ़े किसान को मार डाला। पुलिसिया फायरिंग में 10 किसान मारे गए।

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लेकिन, देखते-देखते बंगाल के नक्सलवाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन आंध्रा तेलंगाना मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र तमिलनाडु कर्नाटक जैसे राज्यों तक फैल गया। नक्सलवादी कम्यूनिष्टों का वह धड़ा है जो मानता है चीन की तरह सशस्त्र क्रांति कर के अपने अधिकारों को प्राप्त किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह अपनी लड़ाई को पूंजीवाद के विरुद्ध जल जंगल जमीन प्रकृति बचाने की लड़ाई कहते हैं। नक्सलवाड़ी आंदोलन के बाद कम्युनिस्ट ऊपर से नीचे तक कई धड़ों में बंट गए। इसमें एक धड़ा वह है जो मानता है बंदूकों से क्रांति सम्भव नहीं या सशस्त्र क्रांति के लिए अभी वक़्त सही नहीं इसलिए यह धड़ा संसदीय व गैर-संसदीय राजनीति के जरिये अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाता है लेकिन अभी ज्यादा कामयाब नहीं हुआ है। दूसरा धड़ा जिसे हम माओवाद या माओवादी कहते हैं जो बंदूकों के दम पर हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देता है।

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नक्सवादी आंदोलन की शुरुवात भले बिगुल किसान से हुवा लेकिन इस आंदोलन के जनक चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथान थे। नक्सलवाड़ी आंदोलन के एक नेता चारु मजूमदार की कोलकत्ता के लाल बाजार थाने में मृत्यु हुई थी। दूसरे नेता कानू सान्याल पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े भूमिगत हो गए बाद में इन्होंने आत्महत्या कर ली । 28 जुलाई 1967 को रेडियो पेइजिंग ने नक्सलवाड़ी आंदोलन को वसन्त का वज्रनाद की संज्ञा दी थी। नक्सलवाड़ी आंदोलन के तीसरे नेता जांगल सांथाल 80 के दशक में एल्कोहिक (शराबी) बन कर मर गए । नक्सलवाड़ी आंदोलन के शुरुवाती नेता सब मर चुके हैं।

कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अरुंधति रॉय जैसी कुछ हस्तियों के अलावा उनके समर्थन में कोई विशेष शहरी गोलबंदी नहीं देखी जाती। देश की मध्यवर्गीय राजनीतिक संस्कृति, मैदानी किसानों की राजनीति और मज़दूर आंदोलन पर माओवादियों का प्रभाव न के बराबर है। अपनी इस नाकामी को वे स्वयं भी स्वीकारते हैं। माओ ने कहा था कि “एक चिनगारी सारे जंगल में आग लगा देती है।” नक्सलबाड़ी से हो कर दण्डकारण्य तक पहुँचने वाले नक्सलवादी आंदोलन का यह हश्र बताता है कि भारत जैसे देश और समाज में क्रांति सि़र्फ एक चिंगारी का खेल नहीं है।

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पश्चिम बंगाल की छोटी सी जगह नक्सलवाड़ी से आंदोलन प्रारम्भ होने के कारण इस विचारधारा को नक्सलवादी विचारधारा कहते हैं जो अब कई भागों में बंट चुकी है। नक्सलवादी आंदोलन अपने लक्ष्य से भटक चुका है।

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जंगलों में खान खनन खनिज सहित तस्करी एवं तेंदू पता तक तमाम कारोबारों से नक्सलियों के पास फंडिंग्स होती है। एक अनुमान के मुताबिक नक्सलियों को सालाना 1200 करोड़ या इससे अधिक की फंडिंग्स होती है। नक्सलवाड़ी आंदोलन के बाद ऊपर से नीचे तक अनेक भागों में बंटे कम्युनिस्ट जरूरत के वक़्त एक दूजे के साथ फिर उठ खड़े होते हैं।

नक्सली हिंसा में अब तक हमारे हजारों सपूत शहीद हो चुके हैं

अब वो वक़्त आ गया है कि श्रीलंका की तर्ज पर जैसे उन्होंने लिट्टे/एलटीटीई का खात्मा किया वैसे ही दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए भारत मे भी निर्ममतापूर्वक नक्सल/माओवाद का खात्मा किया जाना चाहिए। करीब 5 दशक से चले आ रहे नक्सलवाड़ी आंदोलन ने लील लिया है हमारे सपूतों को। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा और बस्तर में अक्सर नक्सलियों और CRPF के जवानों के बीच मुठभेड़ में हमारे जवानों की कुर्बानी हो जाती हैं। नक्सली हमलों में अब तक शहीद हुए समस्त भारतीय सपूतों को अश्रुपूरित नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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