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बिहार का सबसे मशहूर भोजन लिट्टी चोखा, जानिए इसको बनाने की विधि और इसका इतिहास

लिट्टी-चोखा को बिहार के सिग्नेचर डिश का दर्जा प्राप्त है, जब भी कही बिहार की चर्चा हो और बात लिट्टी चोखा की न हो ऐसा हो नही सकता है। हालांकि, इसे बनाने की विधि इतनी सरल है कि इस हिसाब से लिट्टी को व्यंजन नहीं कहा जा सकता है।

लिट्टी गूंथे हुए आटे की लोई का गोला है जिसे जलते हुए अलाव में, कोयले या गोबर के उपले की आँच पर पकाया जाता है। आजकल आटे के लोई के अंदर चने के सत्तू में नमक मिला कर भी भर लिया जाता है। चोखा आग पर पके हुए आलू, बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियों का भुर्ता है। आग पर पकी सब्ज़ियों को सीधे मसलकर उनमें नमक-तेल और प्याज लहसुन के बारीक टुकड़ों को भी डाल दिया जाता है।

लिट्टी चोखा दुनिया का एकमात्र ऐसा भोजन है जो बिल्कुल कम साधन में कम समय मे आसानी से तैयार होता है। इसमें पानी भी बहुत कम लगता है। लिट्टी चोखे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह रसोई घर मे नही बनाई जाती है। जाड़े के समय मे आग सेंकते हुए पुरूष ही इसे तैयार करते या फिर घर से बाहर कोयले या गोबर के उपलों पर तैयार होता है।

बिहार से बाहर लिट्टी चोखा

90 के दशक तक लिट्टी चोखा सिर्फ बिहार और पूर्वांचल के कुछ राज्यो तक सीमित था। लेकिन 90 के दशक के बाद जब बिहार से कामगारों और छात्रों का रुख बिहार के तरफ हुवा तब यह उनके साथ अन्य राज्यो में भी पहुँच गया।

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अब दिल्ली और मुंबई में भी सड़को के किनारे लिट्टी चोखे के ठेले दिख जाते है। बिहार के परिदृश्य पर बनने वाली फिल्म खासकर भोजपुरी फिल्मों ने भी लिट्टी चोखा के ब्रांडिंग में जबरदस्त भूमिका निभाई। सेहत के लिए भी तेल में तले समोसे के अपेक्षा लिट्टी चोखा अधिक फायदेमंद होता है। इस कारण भी लोगो ने इसे ज्यादा पसंद किया।

लिट्टी चोखा का इतिहास

बिहार भगौलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कई भागों में बटा हुवा है। चम्पारण, मिथिलांचल, सीमांचल, भोजपुर शाहाबाद और मगध क्षेत्र। लेकिन लिट्टी चोखा मुख्यतः भोजपुर शाहाबाद और मगध क्षेत्र में प्रचलित है।लिट्टी चोखा का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। बिहार के बक्सर जिले में हर साल अगहन माह में पंचकोसी मेला का आयोजन होता है जिसमें देश विदेश से लोग लिट्टी चोखा खाने आते है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान राम विश्वामित्र ऋषि के साथ सिद्धाश्रम आए थे। और यही पर यज्ञ में व्यवधान पैदा करने वाली राक्षसी ताड़का एवं मारीच-सुबाहू को उन्होंने मारा था। इसके बाद इस सिद्ध क्षेत्र में रहने वाले 5 ऋषियों के आश्रम पर भगवान राम आर्शीवाद लेने गये थे। जिन 5 स्थानों पर वे गए, वहां रात्रि विश्राम किया। मुनियों ने उनका स्वागत जिस पदार्थ से किया उसे वो प्रसाद स्वरुप देकर किया। उसी परंपरा के अनुरुप यह मेला यहां आदि काल से अनवरत चलता आ रहा है।

चंद्रगुप्त मौर्य मगध सम्राज्य के राजा थे जिनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी लेकिन उनका साम्राज्य अफ़ग़ानिस्तान तक फैला था। कुछ जानकारों का कहना है कि चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध के दौरान लंबे रास्तों में आसानी से लिट्टी चोखा जैसी चीज़ खाकर आगे बढ़ते जाते थे। हालांकि इसके कोई ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते है।

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ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि तात्या टोपे और झाँसी की रानी के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे क्योंकि उन्हें पकाना बहुत आसान था और बहुत सामानों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी 1857 के विद्रोह में भी विद्रोहियों के लिट्टी चोखा खाकर लड़ने के किस्से भी मिलते हैं। लिट्टी चोखा को बनारस और उसके आस पास के क्षेत्रों में बाटी चोखा कहा जाता है।

आधुनिक काल मे खेतो में पहरेदारी करने वाले किसानों ने लिट्टी चोखा को अपना मुख्य भोजन चुना, बाद में इसकी लोकप्रियता इसे शहरों और फिर मेट्रो शहरों तक ले गयी।

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