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किसान बिल 2020 का सबसे ज्यादा विरोध पंजाब और हरियाणा में ही क्यों ?

कृषि क्षेत्र के विकास और किसानों के आय को बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार ने किसान बिल 2020 लाया। जून में सरकार ने इस कानून के लिए अध्यादेश पारित किया था लेकिन सितम्बर के अंत तक यह बिल संसद के दोनों सदनों से पास होकर कानून का रूप ले लिया। लेकिन सड़क से लेकर संसद तक इस कानून का विरोध जारी है।

क्या है कृषि बिल 2020

कृषि बिल 2020 के अंतर्गत तीन विधेयक है। पहला, आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020, दूसरा दो कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020, और तीसरा कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020 है। लेकिन इन तीनो में सबसे ज्यादा विरोध दूसरे और तीसरे कानून का हो रहा हैं।

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इन विधेयकों के ख़िलाफ़ पूरे देश मे विरोध प्रदर्शन हो रहे है। यह विरोध प्रदर्शन सड़क से लेकर संसद तक हो रहा है। लेकिन, सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन पंजाब और हरियाणा के किसान कर रहे है। किसानों का मानना है कि यह विधेयक धीरे-धीरे एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) यानी आम भाषा में कहें तो मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर निजी कंपनियों को बढ़ावा देगा जिससे किसानों को उनकी फ़सल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार यह बात कह चुके हैं कि सरकार MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) समाप्त नहीं कर रही है और न ही सरकारी ख़रीद को बंद कर रही है।

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पंजाब और हरियाणा में कृषि और कृषि मंडी

देश मे आज़ादी के बाद कृषि क्षेत्र में सबसे ज्यादा विकास पंजाब में हुआ। 1976 तक पंजाब में खेतों तक पहुँचने के बेहतर सड़क और किसानों के फसल के लिए मंडिया बनकर तैयार हो गयी। 1980 आते आते सारे गाँव कृषि मंडियों से जुड़ गए। यह सब कुछ सम्भव हुआ 2 प्रतिशत बाजार शुल्क और आरडीएफ के कारण। फसल तैयार होने के बाद पंजाब के किसानों की भी व्यपारी का इंतज़ार नही करना पड़ता है, उनके सारे फसलों की सरकारी खरीद होती है वो भी 100% MSP( न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर। यही कारण है कि कभी 26 फसल उगाने वाला किसान आज सिर्फ 2 फसल धान और गेहूं कि खेती करता है क्योंकि सरकारी खरीद सिर्फ धान और गेहूं की होती हैं।

यही स्थिति हरियाणा की भी है। हरियाणा के किसान 1966 से पहले ‘पंजाब एग्रीकल्चरल बोर्ड’ के माध्यम से अपनी उपज बेचते थे। पंजाब से अगल होने के बाद हरियाणा के तत्कालीन सीएम ने हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड का गठन किया। यह बोर्ड कृषि मंत्रालय के अधीन काम करता है। मार्केटिंग बोर्ड ने गाँव और कस्बो में सड़के बनवाई, मंडिया बनी, किसानों को मंडियों से जोड़ा और मंडियों में आढ़तियों को रिजर्व प्राइस पर दुकानें दी गयी। बाद में 25 से 30 फीसदी किसान ही आढ़तिये बन गए। यहाँ आपको दु की आढ़तिये किसान और सरकार के बीच वो बिचौलिए हैं जो कमीशन पर काम करते हैं। पंजाब और हरियाणा के कृषि मंडियों में 25 से 30 प्रतिशत किसान ही आढ़तिये हैं।

शांता कुमार समिति के रिपोर्ट के अनुसार भारत मे मात्र 5 से 6 फिसती किसानों को ही MSP का फायदा मिलता हैं और जहाँ तक हमे लगता है कि वो 5 से 6 फीसदी किसान पंजाब हरियाणा के ही हैं। इतना कुछ देखने के बाद अब स्पस्ट है कि जिन किसानों का कृषि मंडियों से और MSP से ज्यादा फायदा है वही किसान ही न कृषि मंडी और MSP को लेकर आंदोलन करेंगे। तो जब पंजाब और हरियाणा ही इसने अग्रणी हैं।

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पंजाब हरियाणा के अलावा भारत के अन्य राज्य

अगर हम बात पंजाब और हरियाणा के अलावा अन्य राज्य की करे तो बहुत बड़ा अंतर मिलेगा। उदाहरण के लिए बिहार को लीजिए। पंजाब के हर तहसील और पंचायत में कृषि बाजार है लेकिन बिहार में एक जिले में सिर्फ एक ही कृषि बाजार है, वो भी वोटो की गिनती, चुनाव और अन्य सरकारी कामकाजो के लिये इस्तेमाल होता है। हालांकि, बिहार में 2006 से कृषि मंडी बन्द है, जिसे APMC मंडी यानी कृषि उपज बाजार समिति कहा जाता हैं। कृषि बाजार के बन्द होने से किसानों को उनके उपज का MSP नही मिल पाता है उन्हें अपना उपज स्थानीय व्यपारियो से औनो पौनो दामों में बेचना पड़ता हैं जिसके कारण किसानों को 2006 से अब तक एक 25 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। कृषि कार्य मे हो रहे इस लगातार नुकसान के कारण बिहार के किसानों ने खेती छोड़ना शुरू कर दिया। जो बड़े किसान थे वो अपने जमीन पर गोदाम बनाकर उसे किराए पर देकर अन्य तरीको से कमाने लगे, छोटे और मझौलो किसान अपने खेत को पट्टा पर देकर मजदूरी करने पर विवस हैं। जहाँ पंजाब और हरियाणा और एक किसान अपने खेती से सूखी सम्पन्न हैं अपने अगली पीढ़ी को भी खेती के लिए प्रोत्साहित करता है वही बिहार में एक किसान अपने जमीन को बेचकर अपने अगली पीढ़ी को अन्य कारोबार में धकेल रहा है। लगभग यही स्थिति उत्तर प्रदेश, और बंगाल की है।

अगर हम बात महाराष्ट्र की करे तो महाराष्ट्र में ज्यादातर गन्ना और कपास की खेती होती है ये दोनों फसल कृषि बाजार में के बजाय चीनी मिल और सूती वस्त्र उधोग में उचित दाम ओर बिक जाता हैं। गुजरात के किसान भी अपना माल सूती वस्त्र मील में बेचकर खुश हैं। असम के चाय बागान मालिक आपके चाय और कॉफी भी व्यपारिक दरों पर बगान मालिको को बेच देते है। केरल के रबड़ उत्पादक भी सीधा रबर फैक्टरियों के सम्पर्क में हैं।

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पंजाब और हरियाणा में विरोध का कारण

उपरोक्त सभी स्थितियों को देखने के बाद अब यह स्पष्ट है कि APMC कृषि मंडी और MSP से सीधा मुनाफा कमाते हैं। सरकार के नई किसान नीति से कृषि बिल से पंजाब और हरियाणा के कृषि मंडी के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा हैं। इसलिए इस नए कृषि बिल का सबसे ज्यादा विरोध पंजाब हरियाणा में हो रहा है। इसका दूसरा कारण यह भी की देश मे सबसे ज्यादा ताकतवर और एकजुट किसान संगठन पंजाब और हरियाणा में ही है। पंजाब और हरियाणा में किसानों का एक बड़ा वोट बैंक है। यह वोट बैंक इतना बड़ा है कि सरकार बनाने में निर्णायक साबित होता है। इसी वोट बैंक के लिए शिरोमणि अकाली दल के हरसिमरत कौर ने अपना केंद सरकार के मंत्रीपद को त्याग कर किसानों के साथ खड़ा होने पर मजबूर हुई है।

अगर किसान आंदोलन के इतिहास को देखें तो आपको पता चलेगा कि हमेशा से किसान आंदोलन का केंद्र ज़्यादातर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है। पंजाब और हरियाणा के किसान जब भी सरकार के खिलाफ होते है तो दिल्ली पहुँच कर विशाल रैली कर सरकार और संसद को घेर लेते हैं। पंजाब और हरियाणा में हमेशा से ही किसान आंदोलन लंबे और जोरदार होते रहे है।

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