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भारतीय राजनीति के दिवंगत नेता जॉर्ज फर्नांडिस का राजनैतिक और वैवाहिक जीवन

भारतीय राजनीति मे विस्मृत हो चुके जॉर्ज फर्नांडिस को उनको मौत के बाद कभी वो दर्जा नही मिला जो बाबा साहब अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अन्य दिवंगत नेताओं को मिलता है। सवाल ये भी है कि आखिर जॉर्ज साहब को वो दर्जा क्यों मिलेगा? जॉर्ज साहब तो किसी खास जाती धर्म के वोट बैंक की अगुवानी तो करते नही थे और न ही जॉर्ज साहब के नाम पर कोई वोट बैंक आकर्षित होगा।

जॉर्ज साहब का जन्म 3 जून 1930 को कर्नाटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुवा था। उनकी मां किंग जॉर्ज फिफ्थ की बड़ी प्रशंसक थीं। उन्हीं के नाम पर अपने छह बच्चों में से सबसे बड़े का नाम उन्होंने जॉर्ज रखा।

मंगलौर में पले-बढ़े फर्नांडिस जब 16 साल के हुए तो एक क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजे गए। पर चर्च में पाखंड देखकर उनका उससे मोहभंग हो गया। उन्होंने 18 साल की उम्र में चर्च छोड़ दिया और रोजगार की तलाश में बंबई चले आए। इस दौरान वे चौपाटी की बेंच पर सोया करते थे और लगातार सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। धीरे धीरे वे इन आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लेने लगे और 1950 आते-आते वे टैक्सी ड्राइवर यूनियन के बेताज बादशाह बन गए।

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उस वक्त भले ही मध्यवर्गीय और उच्चवर्गीय लोग जॉर्ज फर्नांडिस को बदमाश, उपद्रवी और तोड़-फोड़ करने वाला कहते हों लेकिन बंबई के सैकड़ों-हजारों गरीबों और मजदूरों के लिए वे एक मसीहा थे। इसी दौरान 1967 के लोकसभा चुनावों में वे उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं में से एक एसके पाटिल के सामने मैदान में उतरे। बॉम्बे साउथ की इस सीट से जब उन्होंने पाटिल को हराया तो लोग उन्हें ‘जॉर्ज द जायंट किलर’ भी कहने लगे।

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कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बंबई सहित सम्पूर्ण भारत के इतिहास में गरीबो और मजदूरों को एकजुट कर इतना बड़ा हड़ताल और बंद करने वाला फिर कोई नेता पैदा नही हुवा। जॉर्ज साहब के बाद बाला साहब के अहवाहन पर सम्पूर्ण बम्बई रुक तो जाता था लेकिन बाला साहब बम्बई तक ही सिमट कर रह गए।

1973 में जॉर्ज फर्नांडिस ‘ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन’ के चेयरमैन चुने गए। इंडियन रेलवे में उस वक्त करीब 14 लाख लोग काम किया करते थे। रेलवे कामगारों के कुछ जरूरी मांगो को लेकर जॉर्ज ने आठ मई, 1974 को देशव्यापी रेल हड़ताल का आह्वान किया रेल का चक्का जाम हो गया।

पहले तो सरकार ने ध्यान नही दिया लेकिन बाद में जब इस आंदोलन में टैक्सी चालक और दिहाड़ी मजदूर सहित अन्य कामगार शामिल हुए तो सरकार संकट में आ गयी। आंदोलन को कुचलते हुए 30 हजार लोगों को गिरफ्तार कर लिया इसमें जॉर्ज भी गिरफ्तार हुए लेकिन अंततः सरकार को झुकना पड़ा।

आपातकाल और जॉर्ज फर्नांडिस

आपातकाल लगने की सूचना जॉर्ज को रेडियो पर मिली। उस वक्त वे उड़ीसा में अपनी पत्नी लैला कबीर के साथ थे। उनको पता था सरकार के सबसे पहले निशाने पर होने वालों में वे भी शामिल हैं। इसलिए वो पूरे आपातकाल के दौरान भेष बदल कर चुप चाप सरकार विरोधी आंदोलनों को हवा देते रहे। वो कभी मछुवारे कभी संत तो कभी सिक्ख गुरु बनकर समाजवादी आंदोलनों और आपातकाल के विरोध में सक्रिय लोगो को उकसाते रहे।

आपातकाल पर लिखी कूमी कपूर की किताब के अनुसार जॉर्ज के आपातकाल के समय पूरे विश्व का ध्यान भारत की तरफ आकर्षित करने के लिए डायनामाइट विस्फ़ोट का सहारा लिया। जॉर्ज और उनके समर्थकों को डायनामाइट विस्फ़ोट की ट्रेनिग बड़ौदा में मिली थी।जॉर्ज समर्थकों के निशाने पर मुख्यत: खाली सरकारी भवन, पुल, रेलवे लाइन और इंदिरा गांधी की सभाओं के नजदीक की जगहें थीं। जॉर्ज और उऩके साथियों को जून 1976 में गिरफ्तार कर लिया गया।

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इसके बाद उन सहित 25 लोगों के खिलाफ सीबीआई ने मामला दर्ज किया जिसे बड़ौदा डायनामाइट केस के नाम से जाना जाता है। बाद में जब जनता पार्टी की सरकार आयी तो इस केश को बन्द कर दिया गया।

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मुजफ्फरपुर से की राजनीति की शुरुवात

आपातकाल खत्म होने के बाद फर्नांडिस ने 1977 का लोकसभा चुनाव जेल में रहते हुए ही बिहार के मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से रिकॉर्ड मतों से जीता। जनता पार्टी की सरकार में वे उद्योग मंत्री बनाए गये। बाद में जनता पार्टी टूटी, फर्नांडिस ने अपनी पार्टी समता पार्टी बनाई और भाजपा का समर्थन किया। फर्नांडिस ने अपने राजनीतिक जीवन में कुल तीन मंत्रालयों का कार्यभार संभाला – उद्योग, रेल और रक्षा मंत्रालय। लेकिन वे इनमें से किसी में भी सफल नहीं रहे।

दक्षिण में कोंकण रेलवे के विकास का श्रेय उन्हें भले जाता हो लेकिन उनके रक्षा मंत्री रहते हुए परमाणु परीक्षण और ऑपरेशन पराक्रम का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को ही दिया गया। रक्षा मंत्री रहने के दौरान ताबूत घोटाला, तहलका खुलासे और कंधार विमान अपहरण ने इनकी छवि धूमिल करने में कोई कसर नही छोड़ी।

मंत्री के रूप में इनका कार्यकाल भले सफल न रहा हो लेकिन एक सांसद के रूप में मुज़फरपुर मे इनकी चमक कभी भी फीकी नहीं पड़ी।

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